Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

उपला अपि मित्राणि बन्धवो वनपादपाः । वनमध्ये स्थितस्यापि स्वजना मृगपोतकाः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

उन लक्षणो में स्वभावभूत आभ्यन्तर लक्षणों को पहले कहने के लिये उपक्रम करते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, जंगल के बीच में रहते हुए भी उस जीवन्मुक्त पुरुषश्रेष्ठ के पत्थर भी मित्र, वन के वृक्ष भी बन्धु तथा मृगों के वच्चे ही स्वजन बन जाते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि मित्र तथा पत्थर आदि में संयोग तथा वियोग होने पर भी उसकी स्थिति एक-सी बनी रहती है-मित्र आदि के संयोग और वियोग में उसे हर्ष और दुःख नहीं होता