Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
आकीर्णं शून्यमेवास्य विपदश्चातिसंपदः ।
स्थितस्यापि महाराज्ये व्यसनान्येव सूत्सवाः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
महान् राज्य
में स्थित रहने पर भी उस पुरुष के लिए मनुष्यों से ठसाठस भरा स्थान भी बिल्कुल शून्य है,
उस महात्मा के लिए आपत्तियाँ भी (धन तथा बन्धु आदि का नाश भी) सम्पत्तिरूप हैं । वध,
बन्धन तथा परवशता आदि नाना प्रकार के दुःख ही उसके लिए महान् उत्सव के तुल्य रहते
हैं यानी उन दुःखो को वह जीवन्मुक्त महात्मा महान् उत्सव के समान मानता है