Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
असमाधिः समाधानं दुःखमेव महत्सुखम् ।
व्यवहारोऽपि सन्मौनं कर्माण्येवात्यकर्मता ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके
लिए असमाधि भी समाधि है, दुःख को ही वह महान् सुख समझता है, उसका वाचिक व्यवहार
होनेपर भी वह मौन है । यद्यपि उसके सभी कर्म होते ही हैं, फिर भी उसके वे सब कर्म अकर्म
ही है