Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
जाग्रदेव सुषुप्तस्थो जीवन्नेव मृतोपमः ।
करोति सर्वमाचारं न करोति च किंचन ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
वह जाग्रदवस्था में स्थित रहने पर भी सुषुप्त सदृश निर्विकल्पात्मा में स्थित रहता
है । जीवित रहता हुआ भी अशरीरात्मभाव में स्थित होने से मृत प्राणी के तुल्य है । समस्त
आचार भी वह करता है, फिर भी अकर्ता आत्मा में प्रतिष्ठित होने से कुछ नहीं करता