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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

रसिकोऽत्यन्तविरसो निर्घृणो बन्धुवत्सलः । निर्दयोऽत्यन्तकरुणो वितृष्णस्तृष्णयान्वितः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी विषयसुखों में एकमात्र आत्मसुख की दृष्टि रहती है, इसलिए वह रसिक है, किन्तु विषयदृष्टि से तो वह अत्यन्त विरक्त है । चूँकि किसी व्यक्तिविशेष मेँ वह स्वीयताबुद्धि नहीं रखता, इसलिए उसमें करुणा तो है ही नहीं, किन्तु स्वात्मता बुद्धि से निरुपाधि प्रेम होने के कारण वह बन्धुओं मे वत्सल है । दयाविषय द्वितीय वस्तु को वह नहीं देखता, इसलिए दयाशून्य है, लेकिन अपने शरीर की उपमा द्वारा वह दूसरे के शरीर मेँ भी सुखदुःख का अवलोकन करने से अत्यन्त करुणा से युक्त है । इसी तरह परिपूर्ण होने से वह तृष्णा से शून्य है, किन्तु अज्ञजनों का उद्धार करना उसका स्वभाव है, अतः उनके हित की तृष्णा से अन्वित है