Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
स्वसंवेदनसंवेद्यसारा विदितवेद्यता ।
नैषा दर्शयितुं शक्या दृश्यते न च तद्विदा ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
विदितवेद्यता का (तत्त्वज्ञता का) जो सार
(निरतिशय आनन्दरूप सार) है, वह एकमात्र स्वानुभव से ही ज्ञेय है । वह किसी दूसरे को
दिखलाया नहीं जा सकता, क्योकि उस आदमी को भी वह नहीं दिखाई देता जो उसके स्वरूप
को जानता है, किन्तु स्वप्रकाशरूप से वह अनुभूत होता है