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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 41

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

नित्यान्तःशीतलो मौनी सत्त्वीभूतमनोवनिः । परिपूर्णार्णवाकारो गम्भीरप्रकटाशयः ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्तःकरण में शीतल, मौनी, सत्वगुणमय मनवाला ज्ञानी पुरुष सर्वदा परिपूर्ण सागर के समान गम्भीर एवं प्रकट आशयवाला रहता है