Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
निर्वाहितजगद्यात्रः परिपूर्णमना मुनिः ।
यथास्थितमसावास्ते संप्रयाति यथागतम् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
लोकसंग्रह के लिए जगत् के व्यवहारो का निर्वाह करनेवाले परिपूर्णमना
मननशील, जीवन्मुक्त पुरुष स्वरूप में ज्यों का त्यो स्थिर होकर यथाप्राप्त शिष्टाचार का अनुसरण
करता है