Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
जगदेव तृणं यस्य न किंचिद्रज एव वा ।
किं नाम तस्य भवतु अन्यदादेयतां गतम् ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसके लिए सारा संसार तृण के बराबर है, जिसमें रजोगुण का
लेश भी नहीं है, उस धीर तत्त्वज्ञानी महात्मा के लिए आत्मा से अन्य यानी अनात्मभूत क्योकर
उपादेय होगा ?