Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
मन्दारमञ्जरीकुञ्जपिञ्जरा देवभूमयः ।
न तथा ह्लादयन्त्येता यथा पण्डितबुद्धयः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
वह अन्य को आनन्द प्रदान करता है इसका स्पष्ट रूप से वर्णन करते हैं /
मन्दार की मंजरी के कुंजों से पिन््जर देवताओं के नन्दनवन की भूमि मनुष्य को वैसा आनन्द
नहीं दे सकती, जैसा कि आह्वाद उपदेश आदि द्वारा ज्ञानियों की बुद्धियाँ देती हैं