Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
चन्द्रबिम्बैर्वसन्तैश्च महतामहताशयैः ।
सारं सौभाग्यसौगन्ध्यसौरभालोकभोगिषु ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
सारग्राही
विवेकी पुरुष ग्रीष्म ऋतु सम्बन्धी आलोकभोगियों में चन्द्रबिम्बों से, सुगंधभोगियों मेँ वसन्त से तथा
सौभाग्यभोगियों में तत्त्ववेत्ताओं के रागादि से अनुपहत आशगयों से सार ग्रहण करता है