Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
व्यवहारं यथाप्राप्तं लोकसामान्यमाचरन् ।
चराचराणां भूतानामुपर्येवावतिष्ठते ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
यथाप्राप्त लोकसामान्य
व्यवहार का सम्पादन करता हुआ वह जीवन्मुक्त विवेकीपुरुष समस्त चराचर प्राणियों के ऊपर
(उत्कर्षं में अथवा ऊर्ध्वभूत ब्रह्म मेँ) अवस्थित रहता है