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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 49

संस्कृत श्लोक

प्रज्ञाप्रासादमारूढस्त्वशोच्यः शोचते जनान् । भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान्प्रज्ञोऽनुपश्यति ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानी की ऊपर स्थिति कैसे रहती है, यह दिखलाते हैं / तत्त्वज्ञानी पुरुष प्रज्ञारूपी महल के ऊपर आरुढ होकर स्वयं अशोच्य हो अज्ञानियों के विषय में शोक करता है । वह सबको ऐसे देखता है, जैसे पर्वत पर खड़े मनुष्य भूमिपर स्थित जनों को देखते हैं