Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
हसन्स शान्तया वृत्त्या प्राक्तनीर्जागतीर्गतीः ।
स्मयमान इवास्तेऽन्तर्जनताश्च घनभ्रमाः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राक्तन संसार की गतियो को अतिशान्त वृत्ति से हसता हुआ तथा गाढ़ भ्रम से परिपूर्ण
यानी महान् अज्ञान से भरे जनसमूहों के प्रति अपने अन्तःकरण में मुस्कराता हुआ सा स्थित
रहता है