Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
एताः कान्तारनिर्मग्नमिताः संसारदृष्टयः ।
असत्यो हृतवत्यो मामित्यन्तर्याति विस्मयम् ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
ये असद्रूप सांसारिक दृष्टियाँ, जो जंगल में रास्ता न मिलने से अन्धा बनकर
इधर-उधर भटक रहे अन्धपुरुष से उपमित हैं, मुझे मोहित करती थीं, ऐसा विचार कर वह
ज्ञानी पुरुष भीतर विस्मय को प्राप्त होता है