Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
दृष्ट्याष्टगुणमैश्वर्यमनिष्टं मे तृणायते ।
इत्युपैत्युपशान्तत्वात्स्मयमानोऽपि न स्मयम् ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
यह मेरा परम सौभाग्य है कि अष्टविध
परिपूर्ण ऐश्वर्य मुझे अनिष्ट तथा तृण के समान अवभासित हो रहे हैं, ऐसा समझकर कुछ
हँसता हुआ भी गर्व उपशान्त होने से गर्वं नहीं करता है