Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
कश्चित्त्यक्तसमाचारः कश्चिच्छ्रोत्रियनायकः ।
कश्चिदुन्मत्तचरितः प्रव्रज्यां कश्चिदाश्रितः ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई समस्त आचारो से शून्य होता है, तो कोई
आचार-अनुष्ठान मेँ श्रोत्रियो का नायक होता है, कोई उन्मत्त पुरुष के तुल्य चरित्रवाला होता है
और कोई संन्यास धर्म धारण कर स्थित रहता है