Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
गुटिकाञ्जनखङ्गादिसिद्धः कश्चिन्नभोगतः ।
कश्चिच्छिल्पकलाजीवी कश्चित्पामररूपभृत् ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई गुटिका, अंजन या खड्ग आदि से सिद्ध होकर आकाशगामी
बना रहता है तो कोई शिल्प कला से अपनी जीविका का सम्पादन करता है ओर कोई पामर के
समान रूप धारण कर स्थित रहता है