Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 62
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 62 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
पातालमाविशतु यातु नभो विलङ्घ्य दिङ्मण्डलं भ्रमतु पेषणमेव येन ।
चिन्मात्रमेतदजरं न तु यातु नाशमाकाशकोश इवशान्तमजं शिवं तत् ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानी पुरुष जबर्दस्ती स्वयं नष्ट हो जाने की इच्छा
से पाताल में प्रवेश कर जाय, आकाश को लाँघकर उसके ऊपर चला जाय, दिगूमण्डल में भ्रमण
करे, जिससे कि मानसोत्तर लोकालोकादि पर्वतों से वह चूर्ण-चूर्ण हो जाय। परन्तु इसका जो
चिन्मात्रस्वरूप हे, वह अजर ही बना रहता है, कदापि उसका नाश नहीं होता, क्योंकि वह तो
आकाशकोश के सदृश सर्वदा शान्त, अज और शिवरूप ही है- उपप्लवरहित नित्य
निरतिशयानन्दरूप ही है