Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 103, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 103, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
भामात्रं भानमात्रं वा शान्तं भासत एव च ।
चिन्मात्रं यदनाद्यन्तं तस्य नाशः कथं कदा ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
सबसे पहले विकिलामान्य की अविनाशीता का सवके अनुभव बल से साधन करते हैं /
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जाग्रत् तथा स्वप्नावस्था में अन्तःकरण के साक्षीरूप
से तथा सुषुप्ति-दशा में अज्ञान, स्वप्नादि के साक्षीरूप से प्रत्यगात्म प्रकाशमात्र अथवा विषय-
प्रकाशमात्र सबको भासता है, इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण से और व्यवहार से तथा स्मृति प्रमाणों से जो
आदि एवं अन्त से रहित, शान्त, चिन्मात्र है, वह तो सिद्ध ही है उसका भला नाश किस कारण
से होगा ? यदि कहो, उससे असाधित कारण से उसका नाश होगा तो उससे असाधित कारण ही
प्रसिद्ध नहीं है और उसके द्वारा जो साधित है उसका तो वह उपजीवक है, इसलिए वह उसके नाश
का हेतु कैसे हो सकता है अतः उसका कभी भी नाश नहीं हो सकता । यदि आप काल को उसके
नाश का निमित्त बताये, तो काल भी उसके नाश का निमित्त नहीं हो सकता, क्योकि काल की भी
सिद्धि तो उसी के अधीन हे, अतः उसका भी वह उपजीवक है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ ढोवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तीनवाँ सर्ग चिति की नित्यता, एकता तथा स्वातंत्र्य का साधन तथा इस सत्-शास्त्र की महिमा और हितोपदेश का वर्णन।