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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 12

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

सत्यसंकल्प ब्रह्मरूपी (=) भाव यह कि पूर्वकाल की चिति से उत्तरकाल की चिति का भेद किंमूलक है ? क्या मध्य मे विच्छेदज्ञान से उसकी कल्पना की जाती है या वह पहली से विलक्षण है, इसलिए भेद की कल्पना की जाती है ? विच्छेदज्ञान से वह अन्य नहीं हो सकती, क्योकि अनुभव ही चिति है, अनुभव रहते विच्छेद की सिद्धि नहीं हो सकती । पूर्व चिति से वह विलक्षण भी नहीं है, क्योकि यदि विलक्षण मानी जाय तो (अचित्‌ हो जायेगी । पूर्व ओर उत्तरकाल की चिति में सर्वाश में अनुभव की समानता है, अतः वह भिन्नता (अन्यता) कैसी ? अर्थात्‌ पूर्व ओर उत्तर चिति की भिन्नता मिथ्या ही है । संवित्‌ के सिवाय प्रधान (प्रकृति), परमाणु आदि सृष्टि के आरम्भ में कारण कदापि नहीं हो सकते । ब्रह्म से अतिरिक्त जो भी कारण वादियों को जँचता है, कृपया वे उसका स्वरूप तथा उसके कारण होने में जो युक्ति हो, उसका उपपादन करं । मैं उनका झटपट श्रुति और युक्तियों द्वारा खण्डन करूँगा