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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 18

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस्रलिए विचार के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए यह बात मैं अनेक बार कह बुका हूँ. ऐसा कहते हैं / इस आत्मज्ञान के विचार में ही बुद्धि का यत्नपूर्वक उपयोग करना चाहिये । यत्नपूर्वक किया गया परम विचार इस लोक और परलोक दोनों लोकों में सिद्धि देने वाला है । सूत्र में भी कहा है- "आवृत्तिरसकृदुपदेशात्‌ (दुर्य आत्मसाक्षात्कार आवृत्तिविशिष्ट श्रवण आदि से साध्य है, अतः उसकी आवृत्ति करनी चाहये ), 'ऐहिकमप्रस्तुतप्रतिबन्धेन तद्दर्शनात्‌* (विद्या से अविरूद्ध फलवाले फलोन्मुख समझ से प्रतिबन्ध का अभाव होने पर इस जन्म में भी विद्या की उत्पत्ति हो सकती है, प्रतिबन्ध होने पर जन्मान्तर में भी हो सकती है, इस प्रकार अनियम है, उक्त अनियम श्रुतियों में देखा गया है।)