Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 27
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हिन्दी अर्थ
यह शास्र माता, पिता आदि की भी अपेक्षा अत्यन्त हितकारी है, ऐसा कहते है /
आपका जो हित पिता ने नहीं किया या जो हित माँने नहीं किया अथवा जो हित पुण्यों ने नहीं
किया वह हित यह शास्त्र तुरन्त करेगा, यदि विचार द्वारा आप लोग इसे जान लें