Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 26
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष इस श्रेष्ठतम शास्त्र का विचार कर चुका है, उसे
प्रत्यक्षरूप से आत्मतत्त्व बोध का अनुभव होता है जो कि संसाररूपी मार्ग की थकावट दूर करनेवाला
है । वरदान अथवा शाप के समान चिरकाल के विलम्ब से उसका अनुभव नहीं होता