Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 31
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हिन्दी अर्थ
आरम्भ में आपाततः मधुर प्रतीत होनेवाले शून्यस्वरूप विषयों का
आस्वाद ले रहे आप लोग एकमात्र आकाशरूपिणी अपार सृष्टि की ओर-भूखे अतएव रसशून्य
वायु को चाट रहे सर्पो के समान-न बढ़ें ॥३ ०॥ बड़े खेद की बात है, दिनों द्वारा ही मृत्यु की प्रतीक्षा
कर रहे आप लोगों के जीवन के सारे दिन व्यवहार में ही व्यतीत होते हैं कब दिन आया ओर कब
गया यह भी आप लोगों को ज्ञात नहीं होता