Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 37
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हिन्दी अर्थ
यह वरिष्ठ विर्काल से हम लोगों के उद्बोधन में कमर कसकर लगा हैं, मारे चिल्लाहट के
इसका कण्ठ सूख ग्या है, यह बेचारा कण्ठ सूखने से बच जाय यों मेरे ऊपर दया से मेरा वचन
ध्यान से हुनकर आप लोग अपना स्वरुप जानिये, यों अतिशय वात्सल्यवश कहते हैं /
आप लोगों के उद्बोधन के लिए जी-जान से लगे हुए, आप लोगों के लिए रात-दिन प्रलाप
कर रहे, कण्ठ सूखने आदि क्लेशो से नित्य पीड़ित हो रहे मेरी (जगत्प्रसिद्ध इस वसिष्ठ की) ओर
देखकर दयावश मेरे वचनों को आदर से सुनकर, उदबुद्ध हो, देहेन्द्रियादि परिच्छिन्न आत्मभाव का
परित्याग कर यथार्थब्रह्मात्मता प्राप्त कीजिए