Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verses 42–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verses 42–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 42
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हिन्दी अर्थ
शास्त्रों में मुख्य आख्यानों में यह
सर्वोत्तम है यह अनायास ज्ञान देनेवाला अत्यन्त मनोहर एवं अनादि है । इसमें तत्त्ववेत्ताओं के
सम्प्रदाय में प्रसिद्ध वस्तु से अतिरिक्त स्वकपोलकल्पित कुछ भी वस्तु नहीं है