Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 44
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हिन्दी अर्थ
विविध
आख्यानों और कथाओं से विस्मयजनक इस शास्त्र का कौतुकवश विचार करता हुआ पुरुष
आत्मबोध प्राप्त कर लेता है, इसमें जरा भी संशय नहीं है ॥४ ३॥ सम्पूर्ण शास्त्र मे पारंगत पण्डितां
को भी जो बोध (आत्मज्ञान) आजतक प्राप्त नहीं हुआ वह इस शास्त्र से प्राप्त हो जाता है जैसे कि
सोने की खान में चालने, धोने से अलग किये गयी बालू से सुवर्णं प्राप्त होता है