Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 45
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हिन्दी अर्थ
यदि क आशंका करे कि इसी शाख्र से यदि जान होता है, तो इस शाख्र के रचयिता को
किर शार से ज्ञान हुआ ? जहाँ से उसे ज्ञान हुआ वहीं से हम भी आत्मज्ञान प्राप्त कर लेंगे / यदि
इस शार के रचयिता ने ज्ञान हुए बिना ही रचना की है तो इस शाख्र से ज्ञानोदय की कौन आशा
है 2 इस पर कहते हैं /
यदि यह शास्त्र युक्तियुक्त न होता और विचार करने पर अनुभूतिप्रद न होता तो इस शास्त्र
के कर्ता को कहाँ से बोध हुआ यों उसके कर्ता के बोध के कारणों की छानबीन में निरत होना ठीक
होता। यह शास्त्र तो स्वतः हजारों युक्तियों से युक्त है और अनुभवप्रदान करनेवाला है । इसके
विचारने पर स्वानुभव से ही सब शंकाएँ निवृत्त हो जाती हैं, इसलिए इसीमें सदा निमग्न होना ठीक
है। शास्त्र के रचयिता में बोध हो या नहीं यह शंका कहीं कभी ध्यान में नहीं लानी चाहिए