Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 50

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अथवा मैं आप लोगों का आत्मा ही हूँ आप लोगें के पुण्य से शुद्ध आत्मतत्व का आप लोगों को उपदेश देने के लिए आया हूँ । और मेरे भी आप लोग परम ग्रेमास्पद आत्मा ही हैं; इसलिए आप लोगें का मित्र-स्ा हो ग्रया हूँ. ऐसा कहते हैं / मैं न मनुष्य हूँ, न गन्धर्व हूँ, न देवता हूँ और न राक्षस हूँ, किन्तु आप लोगों का शोधित संविद्रूप सूक्ष्मार्थ (आत्मा) हूँ तथा आप लोगों को आत्मज्ञान का उपदेश देने के लिए यहाँ पर स्थित हूँ । हे श्रीरामजी, आप लोग भी संवद्रिप ही हैं, अति निर्मल संविद्रूप ही मैं आप लोगों के पुण्योदय से स्थित हूँ । मैं आप लोगों की आत्मा से अतिरिक्त नहीं हूँ ॥|४८,४९॥ मैं आप लोगों का अत्यन्त आप्त हूँ , इसलिये जब तक रात्रि के समान अन्धकारपूर्ण मृत्युदिवस पास में नहीं आते तब तक मेरे द्वारा कहा गया सब वस्तुओं में वैराग्यरूप पहला सार पदार्थ बटोरकर रख लीजिये