Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 57
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हिन्दी अर्थ
जगत्
के सभी पदार्थ कारण के अत्यन्त अभाव से सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न ही नहीं हुए, जो यह
प्रतीत होता है वह परम ब्रह्म ही है