Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 73
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 73 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 73
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हिन्दी अर्थ
जैसे वायु में स्पन्द, जल में
द्रवता और आकाश में शून्यता इनसे (वायु आदि से) अभिन्न ही चारों ओर विश्रान्त हैं वैसे ही
चिदाकाश में विश्वाकाश अभिन्न होकर ही चारों ओर विश्रान्त है