Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 72
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 72 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 72
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हिन्दी अर्थ
ङ प्रकार सब कुछ उत्पन्न होने से ब्रह्मअब्वैत प्रिद्धान्त ही निर्बाध है, यह कहते हैं /
इसलिए न तो जगत् कुछ उत्पन्न ही होता है और न विद्यमान ही है। इस प्रकार जगत् के रूप
से निर्मल चिदाकाश ही अपने में अपने आप विकसित होता है