Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 76
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 76 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 76
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हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त चिदाकाश की स्वभाव से अभिन्न ही विवर्तभाव
से जो परम स्थिति है उसी को आपातदर्शी व्यवहारी “जगत्” नाम से पुकारते हैं