Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 77
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 77 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 77
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हिन्दी अर्थ
इसलिए
(७) जिसकी सुन्दर रचना मन को चक्कर में डाल देनेवाली है, अनेक भुवन, गिरि, नदी,
तालाब आदि से युक्त है तथा जरायुज, अण्डज आदि चार प्रकार के प्राणियों से पूर्ण है ।
जगत् ओर चिदाकाश ये दो कदापि परस्पर भिन्न-भिन्न पदार्थ नहीं है जैसे पवन और स्पन्द
दोनों का एक ही रूप है वैसे ही इनका एक ही स्वरूप है