Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 83
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 83 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 83
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हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में चिन्मय ही
नगर पर्वत आदि के रूप से प्रकाश में आता है वैसे ही इस जगत् नामक स्वप्न में वह चिदाकाश
ही स्वयं जगत् के रूप से प्रकाशित हो रहा है