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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 84

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 84 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 84

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

सृष्टि के आरम्भ में पृथिवी आदि पदार्थों की सत्ता ही नहीं है, इसलिए पार्थिव आदि देह का कैसे संभव हो सकता है ? इसलिए यह भासमान शरीरता आकाशरूप चिति का स्वप्न ही है