Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 89
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 89 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 89
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हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में
चिदाकाश ही जगत् का रूप धारण कर लीन हो जाता है वैसे ही जाग्रत नामक स्वप्न में भी,
जन्म धारण किये बिना ही, जगत् का रूप धारण कर नष्ट होता है