Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 104, Verse 95
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 104, verse 95 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 104 · श्लोक 95
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हिन्दी अर्थ
उक्त अभेद में स्यन्द-कायु और वायु-आकाश दरष्टान्त हैं, यह कहते हैं /
जैसे जो ही स्पन्दन है, वही वायु है और जैसे स्पन्दन और अस्पन्दन स्वरूपवाला वायु
आकाश से अभिन्न है वैसे ही चिदाकाश और स्वप्ननगर अभिन्न हैं