Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 105, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 105, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
न जाग्रति न च स्वप्ने जगच्छब्दार्थसंभवः ।
स्वं वस्तुतस्तु चिद्व्योम्नो भानं बुद्धं जगत्तया ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
न तो कहीं पर
पाँच भूत हैं और न घट, दीवार आदि भौतिक पदार्थ ही हैं, किन्तु फिर भी जैसे स्वप्न आदि
में भूतभौतिकशून्य चिति ही भूतभौतिक के समान सबको दिखलाई देती है वैसे ही जाग्रत में
असत् भी भूतभौतिक पदार्थ चितिबल से सत्य-से अनुभूत होते हैं