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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 105, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 105, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

चिद्व्योम्ना स्वचमत्कारो व्योमन्यश्चादिरूपभृत् । जगदित्येव बुद्धोऽन्तर्जाग्रत्स्वप्ने स्वयंभुवा ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न में चित्स्वभाव आत्मा ही नगर पर्वत, आदि के तुल्य प्रकाशित होता है वैसे ही जाग्रत में भी वह सत्‌ चित्‌ सुखरूप आत्मा जगत्‌ के समान प्रकाश में आता है