Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 105, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 105, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
जगन्न किंचिदेवेदं चिद्रूपं च न किंचन ।
एते किंचिदिवाभातो नभश्चिज्जगती मुधा ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं चेतनाकाश ही हूँ, यह
जगत् भी चेतनाकाश रूप ही स्थित है, इसलिए मैं और जगत् दोनों एक ही हैं । वस्तुतः केवल
शिला के समान ठोस चिदाकाश का ही अस्तित्व है