Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 105, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 105, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

आभातमेव त्रैलोक्यं यथा स्वप्ने न किंचन । शून्यमेव भवेदेवमेवं जाग्रति निर्वपुः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

जो आदि सृष्टि में जगत्‌ की उत्पत्ति है और कल्प में (प्रलय में) उसकी निवृत्ति है अथवा जो जगत्‌ की स्थिति है, वह निराकार चिदाकाश ही है