Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
द्रष्टृदर्शनदृश्यानां त्रयाणामुदयो यतः ।
यत्र वास्तमयश्चित्खं तद्विद्धि विगतामयम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे स्वप्न में मेघो, सागरं और पर्वतों की गर्जन आदि ध्वनि सोये हुए
एक स्वप्नद्रष्टा पुरुष के प्रख्यात होने पर पास में सोये हुए दूसरे के (स्वप्न के अद्रष्टा के) प्रति शून्य
ही है, क्योकि पास में सोया हुआ पुरुष जागकर भी मेघ आदि या उनके गर्जन को कुछ भी नहीं
सुनता, वैसे ही जाग्रत् शब्द आदि भी शून्य ही हैं