Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
यदेतदासनं सृष्टं काष्ठपाषाणभूभृताम् ।
चेतनानां च सत्तात्म चिदाकाशः स उच्यते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म ही अत्यन्त विस्तृत शून्यरूप आकाश
पहले बना ओर भूताकाश ही क्रमशःवायु आदि बनकर पर्वतसमूह और विविध नगरों का समूह बना,
यह महान् आश्चर्य है