Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
दिवि भूमौ बहिश्चान्तस्तथान्यस्य समाभिधः ।
यो विभात्यवभासात्मा चिदाकाशः स उच्यते ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न जो
असत् है वह शीघ्र ही संभव हो जाता है जैसे कि दिन ही रात्रि हो जाता है और असंभव संभव हो
जाता है जैसे कि अपनी मृत्यु का दर्शन