Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
यस्मिन्नित्ये तते तन्तौ दृढे स्रगिव तिष्ठति ।
सदसदुत्थितं विश्वं विश्वाङ्गे तच्चिदम्बरम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न में असंभव संभव हो जाता है जैसे कि आकाश
मे जगत् का भान, अन्धकार ही महान प्रकाश बन जाता है ओर जो निद्रायुक्त (रात्रि) है, वह दिन
बन जाता है