Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
तस्माद्दृश्यं न चोत्पन्नं नैवास्ति न भविष्यति ।
न च नश्यति यन्नास्ति तस्य किं नाम नश्यति ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार एक स्वप्न से दूसरे स्वप्न में
स्थिति होने पर दूसरा स्वप्न ही पहले स्वप्न की अपेक्षा वर्तमान होने से विशेष दर्शन यानी जाग्रत्
होता है इसी प्रकार जाग्रत मे मरकर अन्य जाग्रत्रूप स्वप्न में जागे हुए पुरुष का पूर्व जाग्रत अवश्य
स्वप्न है