Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
इहादिसर्गात्प्रभृति नास्त्युपादानकारणम् ।
किंचनापि क्वचिदपि भातीत्थं ब्रह्म केवलम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए अध्यारोपपक्ष में चिन्मात्र ब्रह्म ही जगत् के आकार से
विभक्त है ओर अपवादपक्ष में तो समस्त जगत् चिन्मात्र ब्रह्म हो गया है