Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 106, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 106, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 106 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
यदिदं भासते किंचिद्द्रष्टृदृश्यभ्रमात्मकम् ।
जगदादि परं रूपं तद्विद्धि परमात्मनः ॥ ३५ ॥
स्वप्ने चिन्मात्र एवास्ते यथा गगनकाननम् ।
तथा जगत्तया भाति स्वयं चिन्मात्रमात्मनि ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे हमारे स्वप्न की सकल वस्तुएँ चित् के चमत्काररूप हैं वैसे
ही जाग्रत की भी सब वस्तुएँ चितचमत्कार रूप ही हैं । भला बताइये तो सही स्वप्न में जो पत्थर
दिखाई देता है वह चित् के चमत्कार को छोडकर और क्या हो सकता है ? हे प्राज्ञ, इस विषय में
विद्वानों के साथ युक्तिपूर्वक विचार विनिमय द्वारा निश्चय कीजिये । विचार-विनिमय द्वारा तत्त्वदृष्टि
होने पर वह स्वप्न पत्थर प्रसिद्ध चित् ही ठहरेगा । जैसे स्वप्न का स्वरूप है हूबहू ठीक वैसा ही
स्वरूप जाग्रत् का भी हे